सीरिया में ISIS पर अमेरिका का बड़ा हमला: ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक

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अमेरिका

मध्य पूर्व एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। वर्षों से संघर्ष, गृहयुद्ध और आतंकी संगठनों की गतिविधियों से जूझ रहा सीरिया अब एक नए सैन्य घटनाक्रम का गवाह बना है। दिसंबर 2025 में अमेरिका ने सीरिया के भीतर इस्लामिक स्टेट (ISIS) के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इस कार्रवाई को “ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक” नाम दिया गया है। अमेरिका का कहना है कि यह हमला हाल ही में हुए उस घातक हमले का जवाब है, जिसमें दो अमेरिकी सैनिक और एक अमेरिकी नागरिक की मौत हो गई थी।

यह कार्रवाई सिर्फ एक सैन्य जवाब नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक, रणनीतिक और क्षेत्रीय संदेश भी छिपे हुए हैं। इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि यह हमला क्यों किया गया, इसका तरीका क्या था, इसमें किन देशों ने भूमिका निभाई और इसका असर सीरिया व पूरे मध्य पूर्व पर क्या पड़ सकता है।

ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक क्या है?

अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड के अनुसार, ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक के तहत अमेरिकी लड़ाकू विमानों, अटैक हेलीकॉप्टरों और ज़मीनी तोपखाने ने मिलकर सीरिया के मध्य हिस्सों में मौजूद इस्लामिक स्टेट के ठिकानों पर हमला किया। एक ही दिन में 100 से अधिक हथियारों और गोला-बारूद का इस्तेमाल कर 70 से ज़्यादा संदिग्ध ISIS ठिकानों को निशाना बनाया गया।

यह हमला पूरी तरह योजनाबद्ध और सीमित अवधि के लिए किया गया बताया गया है। अमेरिका ने साफ किया कि यह कोई नई लंबी जंग की शुरुआत नहीं है, बल्कि एक सटीक और निर्णायक जवाब है।

हमले की वजह: अमेरिकी सैनिकों पर घातक हमला

इस सैन्य कार्रवाई की जड़ें 13 दिसंबर 2025 की उस घटना से जुड़ी हैं, जब सीरिया के ऐतिहासिक शहर पलमायरा में अमेरिकी सैनिकों पर घात लगाकर हमला किया गया। इस हमले में:

  • दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई

  • एक अमेरिकी नागरिक दुभाषिया (इंटरप्रेटर) भी मारा गया

यह घटना इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि दिसंबर 2024 में सीरिया में सत्ता परिवर्तन के बाद यह पहली अमेरिकी जनहानि थी। अमेरिका ने सीधे तौर पर इस हमले के लिए इस्लामिक स्टेट को जिम्मेदार ठहराया, भले ही किसी संगठन ने आधिकारिक रूप से जिम्मेदारी न ली हो।

अमेरिकी रक्षा नेतृत्व का कड़ा संदेश

अमेरिकाअमेरिका के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इस कार्रवाई को लेकर बेहद सख्त शब्दों में बयान दिया। उन्होंने कहा कि:

  • यह युद्ध की घोषणा नहीं है

  • यह बदले की कार्रवाई है

  • अमेरिका अपने लोगों की सुरक्षा को लेकर कभी समझौता नहीं करेगा

उनका यह बयान दुनिया को यह संदेश देता है कि अमेरिका अपने सैनिकों पर हमले को हल्के में नहीं लेगा, चाहे वह हमला दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो।

राष्ट्रपति ट्रंप का रुख और सीरिया की अंतरिम सरकार

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस हमले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सीरिया की मौजूदा अंतरिम सरकार इस कार्रवाई से अवगत थी और उसने इसमें सहयोग किया। ट्रंप के मुताबिक, सीरिया का मौजूदा नेतृत्व देश को स्थिरता की ओर ले जाना चाहता है और इस्लामिक स्टेट के सफाए को जरूरी मानता है।

यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि कभी जिस सीरिया में अमेरिका और सरकार आमने-सामने थे, वहां अब सीमित मुद्दों पर सहयोग की स्थिति दिखाई दे रही है।

जॉर्डन की भूमिका: क्षेत्रीय सहयोग का संकेत

इस ऑपरेशन में जॉर्डन की सेनाओं ने भी अमेरिकी सेना की मदद की। जॉर्डन लंबे समय से अमेरिका का रणनीतिक साझेदार रहा है और आतंकवाद विरोधी अभियानों में सहयोग करता रहा है।

जॉर्डन की भागीदारी यह दिखाती है कि इस्लामिक स्टेट अब भी पूरे क्षेत्र के लिए खतरा बना हुआ है और केवल एक देश नहीं, बल्कि कई देश इसे साझा चुनौती मानते हैं।

सीरिया में अमेरिकी मौजूदगी क्यों है?

अक्सर सवाल उठता है कि अमेरिका सीरिया में आखिर कर क्या रहा है। अमेरिका के अनुसार:

  • सीरिया में लगभग 1,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं

  • उनका उद्देश्य इस्लामिक स्टेट के पुनरुत्थान को रोकना है

  • ये सैनिक स्थानीय बलों के साथ मिलकर आतंकवाद-रोधी अभियान चलाते हैं

हालांकि आलोचक कहते हैं कि विदेशी सेनाओं की मौजूदगी सीरिया की संप्रभुता पर सवाल उठाती है, लेकिन अमेरिका का तर्क है कि जब तक ISIS जैसे संगठन सक्रिय हैं, तब तक यह मौजूदगी जरूरी है।

इस्लामिक स्टेट: खत्म नहीं हुआ खतरा

भले ही इस्लामिक स्टेट ने 2018 तक अपना तथाकथित “खिलाफत” खो दिया हो, लेकिन संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज ISIS:

  • छोटे-छोटे गुप्त सेल्स के रूप में काम करता है

  • सीरिया और इराक के दूरदराज इलाकों में सक्रिय है

  • ऑनलाइन प्रचार के जरिए युवाओं को कट्टरपंथ की ओर खींचता है

यही वजह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना है कि संगठन को पूरी तरह नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े हमलों को न्योता देना होगा।

सीरिया की आंतरिक स्थिति और बढ़ती चुनौतियां

यह हमला ऐसे समय हुआ है जब सीरिया खुद एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार देश में नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रही है। लेकिन:

  • जातीय और सांप्रदायिक तनाव अब भी मौजूद हैं

  • कई इलाकों में स्थानीय मिलिशिया सक्रिय हैं

  • आर्थिक हालात बेहद कमजोर हैं

ऐसे माहौल में किसी भी बड़े सैन्य घटनाक्रम का असर देश की स्थिरता पर पड़ता है।

क्या यह हमला तनाव बढ़ाएगा?

अमेरिकाविशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि:

  • यह हमला ISIS को कमजोर करेगा

  • इससे अमेरिका की “रेड लाइन” साफ होगी

वहीं कुछ विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि:

  • इससे आतंकवादी जवाबी हमले कर सकते हैं

  • क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है

  • आम नागरिकों को नुकसान पहुंच सकता है

अमेरिका ने यह जरूर साफ किया है कि अगर उसके सैनिकों पर दोबारा हमला हुआ, तो आगे भी कार्रवाई की जाएगी।

मध्य पूर्व और वैश्विक राजनीति पर असर

सीरिया में हुआ यह हमला केवल एक देश तक सीमित नहीं है। इसका असर:

  • मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति

  • अमेरिका की वैश्विक आतंकवाद-रोधी नीति

  • क्षेत्रीय सहयोग और विरोध
    पर पड़ सकता है।

यह घटना यह भी दिखाती है कि इस्लामिक स्टेट भले ही कमजोर पड़ा हो, लेकिन वह अभी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंडे से बाहर नहीं हुआ है।

ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक अमेरिका की ओर से एक स्पष्ट संदेश है यदि उसके नागरिकों या सैनिकों पर हमला होगा, तो जवाब तेज़ और निर्णायक होगा। यह कार्रवाई सिर्फ बदले की भावना से नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चेतावनी के रूप में भी देखी जा सकती है।

सीरिया के लिए यह समय बेहद नाज़ुक है। देश को स्थिरता, पुनर्निर्माण और शांति की जरूरत है, लेकिन आतंकवाद और बाहरी सैन्य हस्तक्षेप इस रास्ते को और जटिल बना देते हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या यह हमला इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों को वाकई कम कर पाएगा या फिर मध्य पूर्व में एक नए तनाव चक्र की शुरुआत करेगा। अधिक जानकारी के लिए Jatininfo.in को  subscribe करे।

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