भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। भारत ने अमेरिका के सामने अपना फाइनल ऑफर रख दिया है, जिसमें दो मुख्य मांगें शामिल हैं पहली, भारत पर लगाए गए कुल 50% टैरिफ को घटाकर 15% किया जाए, और दूसरी, रूस से कच्चा तेल खरीदने पर लगाई गई 25% अतिरिक्त पेनाल्टी को पूरी तरह खत्म किया जाए।
यह प्रस्ताव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार, महंगाई और भारत-अमेरिका रिश्तों पर भी पड़ेगा। दोनों देशों के बीच एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को लेकर बातचीत जारी है और उम्मीद जताई जा रही है कि नए साल में इस पर कोई बड़ा फैसला सामने आ सकता है।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंध:
भारत और अमेरिका पिछले कुछ वर्षों में एक-दूसरे के अहम रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार बनकर उभरे हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जबकि भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार और मैन्युफैक्चरिंग हब बनता जा रहा है।
हालांकि, बीते समय में दोनों देशों के रिश्तों में टैरिफ, सब्सिडी और व्यापार संतुलन को लेकर कई बार तनाव भी देखने को मिला है। अमेरिका का आरोप रहा है कि भारत अपने बाजार को जरूरत से ज्यादा सुरक्षित रखता है, जबकि भारत का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं।
50% टैरिफ: भारत पर क्यों और कैसे लगाया गया?
अमेरिका ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाया है, जिसे दो हिस्सों में बांटा जा सकता है:
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25% रेसिप्रोकल टैरिफ –
अमेरिका का तर्क है कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर ऊंचा टैक्स लगाता है, इसलिए “जैसे को तैसा” नीति के तहत यह शुल्क लगाया गया। -
25% अतिरिक्त पेनाल्टी –
यह पेनाल्टी भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने की वजह से लगाई गई है। अमेरिका का दावा है कि इससे रूस को यूक्रेन युद्ध जारी रखने में आर्थिक मदद मिलती है।
भारत इन दोनों टैरिफ को अनुचित और भेदभावपूर्ण मानता है।
भारत का फाइनल ऑफर क्या है?
भारत ने अमेरिका के सामने साफ और स्पष्ट प्रस्ताव रखा है:
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कुल टैरिफ को 50% से घटाकर 15% किया जाए
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रूस से तेल खरीदने पर लगाई गई 25% पेनाल्टी को पूरी तरह हटाया जाए
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भारत को वही राहत दी जाए जो यूरोपीय यूनियन (EU) जैसे व्यापारिक ब्लॉक्स को मिल रही है
भारत का कहना है कि अगर उसे समान स्तर की राहत नहीं दी गई, तो भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में नुकसान झेलना पड़ेगा।
अगर अमेरिका भारत का प्रस्ताव मान लेता है
अगर अमेरिका भारत की मांगों को स्वीकार कर लेता है, तो इसके कई सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं:
1. भारतीय निर्यात को बड़ा बढ़ावा
अमेरिका में भारतीय सामान सस्ता होगा, जिससे टेक्सटाइल, फार्मा, आईटी हार्डवेयर, ऑटो पार्ट्स और केमिकल सेक्टर को फायदा मिलेगा।
2. रोजगार के नए अवसर
निर्यात बढ़ने से भारतीय कंपनियों को ज्यादा ऑर्डर मिलेंगे, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और नए रोजगार पैदा होंगे।
3. विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत
अमेरिका से ज्यादा डॉलर आने से भारत का करंट अकाउंट बैलेंस बेहतर होगा और रुपया मजबूत रह सकता है।
4. सस्ता रूसी तेल, महंगाई पर नियंत्रण
रूसी तेल पर पेनाल्टी हटने से भारत बिना दबाव के सस्ता कच्चा तेल खरीद सकेगा, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें काबू में रह सकती हैं।
5. भारत-अमेरिका रिश्तों में मजबूती
टैरिफ विवाद सुलझने से दोनों देशों के बीच बड़ा व्यापार समझौता करना आसान हो जाएगा।
अगर अमेरिका प्रस्ताव नहीं मानता तो क्या होगा?
दूसरी ओर, अगर अमेरिका टैरिफ घटाने से इनकार करता है, तो इसके नकारात्मक असर भी कम नहीं होंगे:
1. भारतीय सामान महंगे रहेंगे
उच्च टैरिफ की वजह से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे बने रहेंगे, जिससे उनकी मांग घट सकती है।
2. उद्योगों पर दबाव
कई एक्सपोर्ट-आधारित इंडस्ट्री का मुनाफा घट सकता है और नौकरियों पर असर पड़ सकता है।
3. ईंधन महंगाई का खतरा
रूसी तेल पर पेनाल्टी जारी रहने से भारत को तेल महंगे दामों पर खरीदना पड़ सकता है, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।
4. कूटनीतिक तनाव
इससे भारत-अमेरिका रिश्तों में खटास आ सकती है और व्यापार समझौते में देरी हो सकती है।
रूसी तेल विवाद: असल वजह क्या है?
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इस दौरान भारत ने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदा।
भारत का तर्क साफ है:
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ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की बुनियादी जरूरत है
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भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन नहीं किया
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यूरोपीय देश भी अप्रत्यक्ष रूप से रूसी ऊर्जा का इस्तेमाल करते रहे हैं
भारत मानता है कि सिर्फ उसे निशाना बनाना दोहरे मापदंड को दर्शाता है।
रूसी तेल आयात में गिरावट: अमेरिका के लिए राहत?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का रूसी तेल आयात हाल के महीनों में घटा है।
जहां नवंबर में यह करीब 17.7 लाख बैरल प्रति दिन था, वहीं दिसंबर में घटकर लगभग 12 लाख बैरल प्रति दिन रह गया।
इसके पीछे वजह है:
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रूस की तेल कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध
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भुगतान और शिपिंग में दिक्कतें
आने वाले समय में यह आयात 10 लाख बैरल प्रति दिन से नीचे जा सकता है। भारत इसी आधार पर अमेरिका से पेनाल्टी हटाने की मांग कर रहा है।
EU जैसी राहत क्यों चाहता है भारत?
भारत का कहना है कि उसे वही टैरिफ राहत मिलनी चाहिए जो यूरोपीय यूनियन को दी गई है।
उदाहरण के तौर पर:
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इंडोनेशिया पर अमेरिकी टैरिफ 32% से घटाकर 19% कर दिया गया
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EU देशों को भी अपेक्षाकृत कम टैरिफ का लाभ मिल रहा है
अगर भारत को ज्यादा टैरिफ देना पड़ा, तो वह प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएगा।
भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है टैरिफ घटाओ, पेनाल्टी हटाओ और बराबरी का व्यवहार करो।
अब फैसला अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के हाथ में है। यह फैसला सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी की दिशा भी तय करेगा।
फैसला जो भविष्य तय करेगा
भारत-अमेरिका ट्रेड वार्ता सिर्फ आंकड़ों और टैरिफ की कहानी नहीं है। यह भरोसे, साझेदारी और वैश्विक संतुलन की परीक्षा है। अगर दोनों देश समझदारी दिखाते हैं, तो यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए जीत साबित हो सकता है। अब सबकी नजर नए साल में आने वाले उस फैसले पर है, जो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की दिशा और दशा तय करेगा। अधिक जानकारी के लिए Jatininfo.in को subscribe करे।











