बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर गंभीर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। देश में अंतरिम सरकार के गठन के बाद जिस स्थिरता की उम्मीद की जा रही थी, वह पूरी होती नज़र नहीं आ रही। उल्टा, अल्पसंख्यकों पर हमले, कट्टरपंथी हिंसा, भारत विरोधी बयानबाज़ी और कानून-व्यवस्था के बिगड़ते हालात ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। इसी बीच बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बयान ने पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे दी है।
शेख हसीना ने सीधे तौर पर अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेशी हिंदुओं पर हो रहे हमलों का जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूनुस सरकार कट्टरपंथी ताकतों को न केवल संरक्षण दे रही है, बल्कि सजायाफ्ता आतंकियों को जेल से रिहा कर देश को अराजकता की ओर धकेल रही है।
शेख हसीना के आरोप क्यों हैं अहम?
शेख हसीना कोई साधारण राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। वे दशकों तक बांग्लादेश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक रही हैं। उनके कार्यकाल में बांग्लादेश ने आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे और क्षेत्रीय सहयोग के कई अहम दौर देखे। ऐसे में जब वे मौजूदा हालात पर खुलकर सवाल उठाती हैं, तो उन्हें सिर्फ राजनीतिक बयान कहकर नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो जाता है।
ANI को दिए गए एक मेल इंटरव्यू में हसीना ने कहा कि बांग्लादेश में जो कुछ भी हो रहा है, वह स्वतःस्फूर्त नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है।
बांग्लादेशी हिंदुओं पर हमले: डर और असुरक्षा का माहौल
हाल के महीनों में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं। मंदिरों पर हमले, दुकानों और घरों में तोड़फोड़, झूठे आरोपों के आधार पर भीड़ द्वारा हत्या ये घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं।
गुरुवार को हुई एक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया, जब दीपू चंद्र दास नाम के एक हिंदू युवक को भीड़ ने ईशनिंदा के झूठे आरोप में पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि यह दिखाती है कि कैसे अफवाहों और कट्टर सोच के दम पर कानून को अपने हाथ में लिया जा रहा है।
शेख हसीना का कहना है कि ऐसी घटनाएं तभी बढ़ती हैं जब सत्ता में बैठे लोग चुप रहते हैं या परोक्ष रूप से समर्थन देते हैं।
कट्टरपंथी ताकतों को संरक्षण का आरोप
हसीना ने आरोप लगाया कि मौजूदा अंतरिम सरकार देश के अंदर कट्टरपंथी संगठनों को ताकत दे रही है। उनके मुताबिक, बाहर की दुनिया को एक उदार और लोकतांत्रिक चेहरा दिखाया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
उन्होंने कहा कि:
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कट्टरपंथी समूह खुलकर हिंसा कर रहे हैं
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मीडिया दफ्तरों पर हमले हो रहे हैं
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अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है
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भारत के खिलाफ नफरत फैलाने की खुली छूट दी जा रही है
हसीना का आरोप है कि यूनुस सरकार के संरक्षण के बिना ऐसा संभव नहीं हो सकता।
आतंकियों की रिहाई और कानून-व्यवस्था का सवाल
शेख हसीना का एक और गंभीर आरोप यह है कि अंतरिम सरकार ने सजा पाए आतंकियों को जेल से रिहा किया है। उनके मुताबिक, इससे कट्टरपंथी तत्वों के हौसले और बुलंद हुए हैं।
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दोषी करार दिए जा चुके लोगों को राजनीतिक कारणों से छोड़ा जाता है, तो इससे न्याय प्रणाली पर जनता का भरोसा टूटता है। यही भरोसा टूटना आगे चलकर भीड़तंत्र और अराजकता को जन्म देता है।
भारत विरोधी भावना और बिगड़ते रिश्ते
शेख हसीना ने बांग्लादेश में बढ़ती भारत विरोधी भावना के लिए भी मोहम्मद यूनुस को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि भारत हमेशा से बांग्लादेश का सबसे भरोसेमंद दोस्त रहा है, लेकिन मौजूदा सरकार की बयानबाज़ी ने दोनों देशों के रिश्तों में खटास पैदा की है।
हसीना के मुताबिक:
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भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान दिए जा रहे हैं
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भारतीय दूतावास और राजनयिकों की सुरक्षा खतरे में है
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यह सब बांग्लादेश के हित में नहीं है
उन्होंने साफ कहा कि भारत को लेकर जो चिंता जताई जा रही है, वह बिल्कुल जायज़ है।
मीडिया पर हमले और लोकतंत्र की सेहत
किसी भी लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका बेहद अहम होती है। लेकिन बांग्लादेश में मीडिया संस्थानों पर हमले यह दिखाते हैं कि असहमति की आवाज़ को दबाने की कोशिश हो रही है।
शेख हसीना ने कहा कि जब पत्रकार सुरक्षित नहीं रहेंगे, तब सच सामने कैसे आएगा? मीडिया दफ्तरों पर हमले लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं।
बांग्लादेश क्यों छोड़ा? हसीना का जवाब
अपने देश छोड़ने को लेकर भी शेख हसीना ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने बांग्लादेश इसलिए छोड़ा ताकि और खून-खराबा न हो, न कि इसलिए कि उन्हें कानून से डर था।
उनका कहना है कि मौजूदा हालात में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और हिंसा आम बात बन गई है। ऐसे माहौल में उनकी मौजूदगी और ज़्यादा टकराव पैदा कर सकती थी।
बढ़ती कट्टरता: सिर्फ बांग्लादेश की समस्या नहीं
हसीना ने चेतावनी दी कि बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता सिर्फ एक देश का मसला नहीं है, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया के लिए खतरा है।
कट्टरपंथी विचारधाराएं सीमाओं में बंधकर नहीं रहतीं। अगर उन्हें समय रहते नहीं रोका गया, तो इसका असर पड़ोसी देशों और पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर बयान: गैर-जिम्मेदाराना राजनीति
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे भारत में “चिकन नेक” कहा जाता है, को लेकर दिए जा रहे बयानों पर भी शेख हसीना ने नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि किसी पड़ोसी देश को धमकाना गैर-जिम्मेदाराना है और यह बांग्लादेशी जनता की सोच नहीं है।
हसीना को भरोसा है कि जब देश में लोकतंत्र लौटेगा, तब ऐसे बयान अपने आप खत्म हो जाएंगे।
भारत-बांग्लादेश रिश्तों को लेकर उम्मीद
शेख हसीना ने भरोसा जताया कि जब बांग्लादेश में फिर से चुनी हुई सरकार आएगी, तब भारत के साथ रिश्ते भी पहले जैसे मजबूत होंगे। उन्होंने भारत को मिले सहयोग और मेहमाननवाज़ी के लिए आभार भी जताया।
उनके मुताबिक, दोनों देशों के रिश्ते राजनीति से ऊपर हैं और जनता के स्तर पर आज भी विश्वास कायम है।
शेख हसीना की वापसी पर सवाल
हसीना ने साफ किया कि वह फिलहाल बांग्लादेश नहीं लौटेंगी। उनका कहना है कि मौजूदा हालात में उनके खिलाफ की जा रही कार्रवाई न्याय नहीं, बल्कि राजनीति से प्रेरित है।
उन्होंने चुनौती दी कि अगर यूनुस सरकार को भरोसा है कि वह सही है, तो इस मामले को अंतरराष्ट्रीय अदालत हेग में ले जाए।
मौत की सजा और ट्रिब्यूनल पर सवाल
शेख हसीना ने इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल के फैसले को भी पूरी तरह खारिज किया। उनका कहना है कि:
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उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला
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अपनी पसंद के वकील रखने की अनुमति नहीं दी गई
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ट्रिब्यूनल का इस्तेमाल अवामी लीग को खत्म करने के लिए किया जा रहा है
उनके मुताबिक, यह न्याय नहीं बल्कि राजनीतिक बदले की कार्रवाई है।
अंतरिम सरकार की वैधता पर सवाल
शेख हसीना ने अंतरिम सरकार की वैधता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह सरकार जनता द्वारा चुनी नहीं गई है, इसलिए इसकी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता नहीं है।
फरवरी में होने वाले चुनावों को लेकर भी उन्होंने कहा कि अवामी लीग पर रोक लगाकर कराए गए चुनाव असली चुनाव नहीं होंगे, बल्कि सिर्फ सत्ता की ताजपोशी होगी।
बांग्लादेश किस दिशा में जा रहा है?
शेख हसीना के बयान बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अल्पसंख्यकों पर हमले, कट्टरपंथ का उभार, मीडिया पर दबाव और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में तनाव ये सभी संकेत देते हैं कि देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है।
बांग्लादेश को इस समय सबसे ज्यादा ज़रूरत है:
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कानून के राज की
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अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की
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स्वतंत्र मीडिया की
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और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली की
अगर हालात पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो इसका असर सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेगा। अधिक जानकारी के लिए Jatininfo.in को subscribe करे।











