टाइम ट्रैवल… सुनते ही दिमाग में पुरानी फिल्में और कहानियां घूमने लगती हैं, जहां लोग मशीन में बैठकर पलक झपकते ही कभी पास्ट में पहुंच जाते हैं तो कभी Future में। ये Concept जितना मजेदार है, उतना ही उलझाने वाला भी है। तो चलिये, आज इसी के बारे में थोड़ी आसान भाषा में बात करते हैं।
टाइम ट्रैवल क्या है?
सिंपल भाषा में कहें तो टाइम ट्रैवल का मतलब है टाइम की जो Normal Flow है, उससे हटकर आगे या पीछे जाना। जैसे हम स्पेस में इधर-उधर घूम सकते हैं, वैसे ही टाइम में भी घूमना, अपनी मर्जी से किसी भी पल में पहुंच जाना।
Scientific नज़रिए से देखें तो ये थोड़ा Complicated है। आइंस्टीन नाम के एक बड़े साइंटिस्ट थे, जिन्होंने Relativity थ्योरी दी थी। इस थ्योरी के हिसाब से टाइम एकदम फिक्स चीज़ नहीं है। ये आपकी स्पीड पर Depend करता है। अगर आप बहुत तेज स्पीड से जाओगे (लाइट की स्पीड के आसपास), तो आपके लिए टाइम स्लो हो जाएगा। इसे टाइम डाइलेशन (Time Dilation) कहते हैं। ये चीज़ प्रैक्टिकली प्रूव भी हो चुकी है।
आइंस्टीन की एक और थ्योरी है, जनरल Relativity। ये ग्रेविटी के बारे में बताती है। इस थ्योरी में कुछ ऐसे आइडियाज़ निकलते हैं जो शायद टाइम ट्रैवल को पॉसिबल कर सकें, जैसे कि वर्महोल्स (Wormholes) और रोटेटिंग ब्लैक होल्स (Rotating Black Holes)।
- वर्महोल्स: ये स्पेस और टाइम में एक तरह के शॉर्टकट हो सकते हैं, जो दो दूर की जगहों को आपस में जोड़ सकते हैं। अगर ऐसा कोई वर्महोल स्टेबल हो जाए, तो थ्योरेटिकली एक आदमी एक तरफ से घुसकर दूसरी तरफ से अलग टाइम या जगह पर निकल सकता है। लेकिन प्रॉब्लम ये है कि वर्महोल बनाने और उसे टिकाए रखने के लिए बहुत ज्यादा एनर्जी चाहिए, जो शायद हमारे पास अभी नहीं है। और ये भी कहा जाता है कि वर्महोल बहुत जल्दी कोलैप्स भी हो जाते हैं।
- रोटेटिंग ब्लैक होल्स: कुछ साइंटिस्ट मानते हैं कि रोटेटिंग ब्लैक होल्स के अंदर ऐसे एरिया हो सकते हैं जहां टाइम और स्पेस का कॉन्सेप्ट ही बदल जाता है, और शायद फ्यूचर या पास्ट में जाना पॉसिबल हो जाए। लेकिन ब्लैक होल के अंदर की कंडीशन इतनी खराब होती है (बहुत ज्यादा ग्रेविटी और डेंसिटी) कि कोई भी चीज़ वहां सर्वाइव नहीं कर पाएगी।
टाइम ट्रैवल में क्या-क्या दिक्कतें हैं?
थ्योरी में तो ये सब सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन रियलिटी में टाइम ट्रैवल में बहुत सारी प्रॉब्लम्स हैं:
- कॉज़ेलिटी का Violation (Violation of Causality): सबसे बड़ी प्रॉब्लम है कॉज़ेलिटी, मतलब कारण और प्रभाव का नियम। अगर आप पास्ट में जाकर कुछ चेंज कर दोगे, तो उसका प्रेजेंट पर क्या असर होगा? ग्रैंडफादर पैराडॉक्स (Grandfather Paradox) इसका बेस्ट एग्जांपल है- अगर आप Past में जाकर अपने दादाजी को मार दो, तो आपका जन्म कैसे होगा? ये पैराडॉक्स दिखाता है कि टाइम ट्रैवल लॉजिकली कितना मुश्किल है।
- एनर्जी की जरूरत (Energy Requirements): वर्महोल को स्टेबल करने जैसी कुछ थ्योरीज़ के लिए तो इतनी नेगेटिव एनर्जी चाहिए जो शायद हमारे पास कभी न हो। अभी तक तो ऐसी नेगेटिव एनर्जी का कोई फिजिकल एग्जांपल भी नहीं मिला है।
- क्लोज्ड टाइमलाइक कर्व्स (Closed Time like Curves – CTCs): कुछ थ्योरीज़ में ऐसे रास्ते बनते हैं जो घूमकर वापस वहीं आ जाते हैं, जिससे पास्ट में जाना थ्योरेटिकली पॉसिबल हो सकता है। लेकिन ये रास्ते सच में बन पाएंगे या नहीं, इस पर बहुत डाउट है।
- कंट्रोल और एक्यूरेसी (Control and Accuracy): मान लो टाइम ट्रैवल पॉसिबल भी हो गया, तो टाइम में किसी फिक्स पॉइंट पर जाना और अनचाहे रिजल्ट से बचना बहुत मुश्किल होगा।
- टेक्नोलॉजी का मसला (Technological Limitations): अभी तो हमारे पास ऐसी कोई टेक्नोलॉजी ही नहीं है जो हमें टाइम में आगे या पीछे भेज सके। फ्यूचर में थोड़ा स्लो मोशन में जाना शायद पॉसिबल हो (लाइट स्पीड के पास जाकर), लेकिन पास्ट में जाने के लिए हमें फिजिक्स के रूल्स को ही बदलना पड़ेगा।
क्या कभी यह मुमकिन होगा?

इसका सीधा जवाब देना अभी मुश्किल है। आइंस्टीन की थ्योरी कुछ पॉसिबिलिटीज तो दिखाती है, लेकिन उन्हें सच करने के लिए हमें बहुत सारी साइंटिफिक और टेक्नोलॉजिकल दीवारें तोड़नी होंगी।
कुछ साइंटिस्ट मानते हैं कि नेचर के जो बेसिक रूल्स हैं, वो टाइम ट्रैवल को होने ही नहीं देंगे। उनका कहना है कि अगर टाइम ट्रैवल पॉसिबल होता तो बहुत सारे पैराडॉक्स होते, जो हमारी फिजिक्स के साथ फिट नहीं बैठते। कुछ थ्योरीज़ तो ये भी कहती हैं कि नेचर खुद ऐसी चीज़ों को होने से रोकती है जो टाइम ट्रैवल करवा सकती हैं।
वहीं, कुछ साइंटिस्ट थोड़े पॉजिटिव हैं। उनका मानना है कि हमारी अभी की समझ शायद अधूरी है, और फ्यूचर में फिजिक्स के नए रूल्स हमें टाइम ट्रैवल के बारे में कुछ और बता सकते हैं। क्वांटम मैकेनिक्स और ग्रेविटी को एक साथ समझने की कोशिश (जैसे स्ट्रिंग थ्योरी) शायद नए आइडियाज़ दे सके।
अब आगे क्या होगा, ये कहना मुश्किल है। हो सकता है टाइम ट्रैवल हमेशा कहानियों में ही रहे। लेकिन साइंस में बहुत सी ऐसी चीजें हुई हैं जो कभी नामुमकिन लगती थीं और फिर पॉसिबल हो गईं। तो अभी हम ये नहीं कह सकते कि फ्यूचर में क्या होगा।
टाइम ट्रैवल एक कमाल का कॉन्सेप्ट है, जो साइंस और हमारी इमेजिनेशन को जोड़ता है। आइंस्टीन की थ्योरी ने हमें सोचने का एक नया तरीका दिया है, और कुछ थ्योरेटिकल पॉसिबिलिटीज भी दिखाई हैं। लेकिन रियलिटी में बहुत सारी प्रॉब्लम्स हैं, खासकर कॉज़ेलिटी और एनर्जी की जरूरत।
अभी की साइंस के हिसाब से पास्ट में जाना तो बहुत मुश्किल लगता है। फ्यूचर में थोड़ा स्लो मोशन में जाना शायद पॉसिबल हो, पर उसमें भी अपनी दिक्कतें हैं।
फिर भी, साइंस तो हमेशा आगे बढ़ती रहती है। फ्यूचर में शायद हम टाइम और स्पेस को और अच्छे से समझ पाएं। तब तक, टाइम ट्रैवल हमारी कहानियों को रंग देता रहेगा और हमें यूनिवर्स के रहस्यों के बारे में सोचने पर मजबूर करता रहेगा। इसका जवाब शायद फ्यूचर ही देगा।
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